Wednesday, 9 June 2021

अव्यक्त

 कितना कुछ होता है 

अंदर

उफान की तरह।


भाषा पाती है 

अक्षम ख़ुद को। 

हज़ारों साल की कोशिशें

क़वायदें 

और दावे 

सब के सब पाए गए नाकाफ़ी। 


नाज़ुकी इतनी कि 

स्पंदन भी ख़तरा हो

दुर्धर्ष इतना कि 

ख़ारिज न किया जा सके। 


क़लम की रौशनाई 

कह नहीं पाती 

जो कोरे पन्ने 

कर जाते हैं बयां, 

कुछ एहसास 

अव्यक्त ही रह जाएँगे

पर रहेंगे, 

नरम गीले सीमेंट पर 

उकेरी गई आकृतियों की तरह 

जो जम कर हो जाएँगे 

ठोस

अमिट

अभिव्यक्त। 

Monday, 7 June 2021

तुम्हारा होना

 तुम्हारा होना 

जैसे वक़्त की पीठ पर हस्ताक्षर

शाश्वत।

जाना तुम्हारा

पर बीतना नहीं,

एक अंतर्भूत एहसास।

Wednesday, 2 October 2019

गांधी जयंती पर गोडसे

गांधी को समझने के दृष्टिकोण से भारतीयों के जीवन में प्राय: तीन चरण होते हैं:-
1. प्राथमिक एवं माध्यमिक कक्षाओं में पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में गांधी एवं अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में लगातार पढ़कर उनके प्रति आदर एवं श्रद्धा के भाव पनपते हैं। किंतु, वह उम्र विश्लेषण की नहीं होती। पढ़ाया जाता है, हम पढ़ते हैं। हमारी स्मृति एवं संस्कार का निर्माण होता है और सभी राष्ट्रीय नायक उस बाल स्मृति/संस्कार में जगमगाते सितारों की तरह विराजमान होते हैं।
2. किशोरावस्था/आरंभिक युवावस्था एक अजीब सी बेसब्री एवं विरोधी तेवर की अवस्था होती है। इस चरण में विचारधारा विशेष द्वारा दुष्प्रचारित एवं अब फेसबुक/व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के फॉरवर्ड पर आधारित ज्ञान की वज़ह से देश/समाज की हर समस्या का कारण गांधी को मानने का फैशन सा होता है। देश के विभाजन का जिम्मेवार गांधी। भगत सिंह की फांसी को न रोकने का कसूरवार गांधी। गांधी न होते तो क्रांतिकारी बहुत पहले देश को आजाद करा चुके होते आदि आदि आदि। ऐसे न जाने कितने ही कपोल रूमानी और बदहवास कुतर्क देश के नुक्कड़ चौराहों पर चिर निरंतर बहसों में शामिल होकर इतिहास की धारा को मोड़ने की कोशिश में लगे हैं।
3. समय बीतता है, उम्र बढ़ती है। बाल्य मन की श्रद्धा और किशोर रूमानियत पीछे छूटती है। तर्क और विश्लेषण की कसौटी पर सारे नायक कसे जाते हैं। और तब हम गांधी को थोड़ा और बेहतर समझ पाते हैं। तब हम समझ पाते हैं कि अपने समकालीन कुछ शानदार व्यक्तित्व वाले नायकों की तुलना में साधारण होने के बावजूद कैसे वह सबसे असाधारण हैं। हम तटस्थ होकर उनका मूल्यांकन करते हैं और समझ पाते हैं कि देश-काल के विभेद के बावजूद आख़िर क्यों नेल्सन मंडेला से लेकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर तक एवं अल्बर्ट आइंस्टीन से लेकर बराक ओबामा तक गांधीवाद में ही प्रेरणा ढूंढ़ते हैं। हम भक्ति के चश्मे से नहीं देखते फिर भी उनकी कमियों और तथाकथित ऐतिहासिक भूलों को वर्तमान के मापदंडों से नहीं बल्कि तात्कालिक परिस्थितियों के बरक्स रखकर निर्णयों को संपूर्णता में समझने की कोशिश करते हैं।

दुर्भाग्य से हम भारतीयों में से अधिकांश के जीवन में तीसरा चरण नहीं आ पाता।

गांधी को पढ़ा जाना चाहिए। अधिक से अधिक। उन पर विमर्श हो, संवाद हो, उनकी आलोचना हो, उन पर प्रहार हो, उन्हें ख़ारिज कीजिए, किंतु उन्हें पढ़कर। WhatsApp University के forwards के आधार पर नहीं।

देर रात यह लिखना पड़ा क्योंकि #गांधी_जयंती के दिन ट्विटर पर सबसे ज्यादा #गोडसे_अमर_रहे ट्रेंड कर रहा था।

Thursday, 6 December 2018

अस्पताल का वेटिंग रूम

कितने दफ़े
बुरे सपनों के दौरान
सहसा टूटी नींद ने तसल्ली बख्शी है
पर अब जबकि दुस्वप्न का दौर
खींचता जा रहा बदस्तूर
सुबह, अपने साथ खालीपन लाती है,
तसल्ली नहीं।

अस्पताल के वेटिंग रूम में
जबकि हर शख्स है भयभीत
सहमा- सा,
देखा है मैंने सबको अनायास
एक दूजे का ग़म साझा करते।
यूं तो सामान्यतया
हर ग़मज़दा इंसान
पाता है अपने ग़म को सबसे बीहड़,
अस्पताल के अंदर दुनियावी तहरीरें
काम नहीं करती हू-ब-हू,
यहां दर्द मापने का कोई स्केल नहीं होता।

वेटिंग रूम में
तकलीफ़ और आशंका की परछाई के बीच
उनींदी आंखें
रोज रात का दुर्गम सफ़र तय करती हैं।
सहसा भोर का सन्नाटा
कोरीडोर में गूंज रही चीत्कारों से
टूटता है और
मन भले ही उस सत्य का
सामना करने में पाता हो
ख़ुद को असमर्थ,
बुद्धि सहज ही भांप लेती है
उम्मीद भरी एक और ज़िन्दगी
बॉडी में तब्दील हो चुकी है।
कई तहों के भीतर
खौफ़ की सिहरन महसूस करते
हम अपनी- अपनी ज़गह पर
और सिमट जाते हैं।
नहीं पाते तहरीरी क़ायदों को
निभाने की ताक़त अपने अंदर।
नहीं जुट पाते सांत्वना के दो शब्द।
आगे का अलक्ष्य फ़ासला
और बीहड़ हो जाता है।
                    राहुल कुमार
                    06/12/2018
           सर गंगाराम हॉस्पिटल, नई दिल्ली।

Sunday, 3 July 2016

दुरुहता

दुरुहता के आरोपों से जूझते हुए
सोचा,
ठिठक कर आत्मचिंतन कर लेना
हमेशा श्रेयष्कर होता है।
दिशा भाषा की हो
या कि ज़िन्दगी की,
अनियंत्रित ठीक नहीं होती।

ठीक उसी वक़्त
अंतस के सांकल में जबरन
क़ैद कर दिए गए कोनों से
गूंजा एक प्रश्न -'वाकई?'
'दिशा' और 'नियंत्रण' की
आवश्यकता तय करने वाले हम,
और क्या क्या तय कर लेते हैं
'स्वयं' की ज़िन्दगी में!

जिस 'समझ' के भरोसे
यह कलम थामी है,
वह स्वयं नहीं स्वतंत्र,
वशीभूत है संस्कारों के
परिस्थितियों ने जिन्हें अपना 'खांचा' दे रखा है।

'तर्क' जिनके सहारे हम
पार पाना चाहते हैं
हर द्वंद्व, हर विरोध से,
वह स्वयं नहीं स्वतंत्र
'सिद्धि' हेतु पैनेपन के अतिरिक्त
अपने अवलंब पर है आश्रित
बुरी तरह से।

जब कि
'समझ' एवं 'तर्क'
स्वयं नहीं स्वतंत्र
जकड़े हुए हैं अदृश्य बेड़ियों से
पहरा जारी है शनै शनै,
तो भी
एक द्रष्टा मन है,
'संजय' की आँखों से देखता,
अतिक्रमण करता हर पराजय बोध का
शंखनाद करता है-
'इंसान लिलिपुट नहीं है'

यद्यपि जीवन गणित नहीं
एवं 'आगमन-निगमन' के दायरें भी
स्वयं को पाते हैं असमर्थ
'डिकोड' कर पाने में इसे पूर्णतः
 हू-ब-हू 'थ्योरी' की तरह,
तो भी,
अनसुलझे प्रश्नों को
नियतिवाद का वाहक क्यों होना चाहिए?
मैं प्रश्न करूँगा
क्यूंकि प्रश्न करना ज़िंदा होना है
और मैं जानता हूँ कि
जिसे 'नियति' कहा जाता एवं
'नियंता' माना जाता है,
वह 'कर्म-इकाइयों' का
अंतराल-मात्र है।

और जब
'दिशा' एवं 'बोध' पर नियंत्रण
का प्रश्न-
कृत्रिम आग्रह है,
'अतिक्रमण' को युग का
मुहावरा बन जाना चाहिए
एवं 'दुरुहता' आरोप नहीं
चुनौती हो,
'सहजता' को झकझोड़ने को,
आवरणों से मुक्ति हेतु।

और भले ही
समझ के स्तर पर
दुर्बोध रहूँ,
भाषायी पर्यावरणविदों के फतवों
के समक्ष साफ़ कर देनी हैं
कुछ बातें
अभी-की-अभी।
दुरुहता और शुद्धतावाद में
नहीं है अन्योन्याश्रय सम्बन्ध
वरन विशुद्धता सीमा है,
रोक है,
मौत है
एवं मिश्रण- प्रगति,
श्रृंखला
शाश्वतता।
      

                       राहुल कुमार
         ('तद्भव' के जून 2016 अंक में प्रकाशित कविता।)

Saturday, 23 May 2015

मैं कहना चाहता हूँ तुमसे




अतेरों * बार रचनाओं के प्रस्फुटन के साथ ही
उनकी भ्रूणहत्या करता रहा हूँ ,
अपराधबोध एवं कुंठा का लम्बा खींचता दंश
जब असह्य होने को आया,
तो यह तय पाया कि
अब मुश्किल है
स्वयं को और जब्त करना
स्वयं से और दूर रहना।



तो मैं कहना चाहता हूँ तुमसे
कि मजबूरी की जो आधी कड़ी
मुझसे जुड़ती है ,
तो कश्मकश का एहसास
इस पार भी तारी है
गोया कि एक जूझन है, बेबसी है,
उलझन है तानों-बानों की
पर, 'रौशनी के चार गुलाबी टुकड़ों'
का एक सिरा इस पार भी जुड़ता है,
जो हर बार लड़खड़ाने,
गिरने,
टूटने
और उठने के क्रम में
आश्वस्त करता है कि
जुड़ने वाली आधी कड़ी
सिर्फ मजबूरी की नहीं,
उजास की भी है.




तो मैं कहना चाहता हूँ तुमसे
कि हाँ,मुझे याद है वो परछाई
जो लहरों के साथ उठती तो थी
पर गिरती नहीं थी,
टूटती नहीं थी.
जितनी सच सघन भावों  के
गुंफन की वो तरलता थी,
उतनी ही निष्कंप उस परछाई की दृढ़ता।
सतह पर कोमलता द्रवीभूत थी
और अंदर ही अंदर
कहीं कुछ ठोस,
इस्पात-सा
पनप रहा था,
आकार ले रही थी एक ज़िद
खुद को पाने की
और खोने की भी एक साथ.




तो मैं कहना चाहता हूँ तुमसे
कि जो कुछ मैं उकेर गया हूँ
भले ही बाहर की ओर न खुले
तुम जोड़ लोगे
इसके असम्बद्ध सिरों को
और एक अर्थ हो जायेगा मुकम्मल।
हटना एक मानसिक अवरोध का
ऊपर से एक घटना की प्रतीति भले न दे,
किन्तु कई बार कितना मानीखेज होता है.
                                          राहुल कुमार
                                     


*अतेरों=अनेक







Monday, 16 February 2015

मुझे आपत्ति है!

'शब्द ब्रह्म है'
यह नहीं कि इस शब्द-समूह
की महत्ता से परिचित नहीं हूँ मैं,
या फिर
इसके सत्य को
संदेह के कठघरे में
खड़ा किया हो कभी भी.
स्वयं रहा मैं उपासक-साधक
शब्दों का,
मुग्ध होकर देखता रहा हूँ
उस जादुई बिम्ब को
जो हो जाता है निर्मित
ध्वनियों के मेल के इर्द-गिर्द।


पर, जब कभी
शब्द करने लगते हैं अभिव्याप्त
अर्थ को,
सीमा-विस्तार शब्दों के
महात्म्य का,
करने लगता है भाव को
पंगु,
मुझे आपत्ति है!


जितनी निरीह है
ओढ़े हुए खोल से
अंतस के खोखलेपन को
ढकने की कोशिश,
उतना ही आपराधिक
शब्दों का 'अर्थ' की सीमा में
अतिक्रमण।
किसने दे दिया संकुचन का यह अधिकार
'ब्रह्म' को?
मुझे आपत्ति है!


मुझे स्वीकार नहीं
कि
शब्द तो सीना ताने
अपने औदात्य के मद में रहें चूर
और अर्थ!
बेबसी के कोने में
मंथन  को अभिशप्त
कि कहाँ तो तय था
जिसका वाहक होना
वह क्योंकर बन बैठा नियंता!
अभिव्यक्ति ही तो शर्त थी
शब्द और अर्थ के बीच
अनुबंध की.


और भले ही,
पुराने उपमानों को
मैला बताने वाले युग कवि ने
स्थापित किया,
कि-
'काव्य सबसे पहले शब्द है
और सबसे अंत में भी
यही बात बच जाती है
कि काव्य शब्द है'
-मुझे आपत्ति है!

                   ( 'तद्भव' के जून 2016 अंक में प्रकाशित कविता।)